Sunday, 5 October 2014

हौसला है हम में कितना/Hausla hai hm me kitna

हौसला है हम में कितना वक़्त पे ये दिखाएँगे
हम अभी से क्या बताएँ वक़्त पे ही बताएँगे

लाख कर ले तू जतन पर क्या हमारा बिगाड़ेगा,
ठान ली हमने भी क़िस्मत अब ख़ुदी से बनाएँगे

ख़ूब देखे घूम हमने साथ अब तक ही तेरे हैं  
आ गई अब अक़्ल हम में कारवाँ बनते जाएँगे

चाँद जैसे घट के आता अपने पूर्ण निखार पे
हम भी गिरते और संभलते अवश्य जग मगाएँगे

क़द अभी छोटा मगर है कल गगन मुठ्ठी में होगा
जब हिमालय भर के सूरज अपने मन में जगाएँगे
-अभिषेक कुमार "अभी"
Hausla hai hm me kitna waqt pe ye dikhayenge.
Hm abhi se kyaa btaayen waqt pe hi btaayenge.

Lakh kar le tu jatn par kyaa hmaara bigaadega,
Than li hmne bhi kismat ab khudi se bnayenge.

Khoob dekhe ghum hmne sath ab tak hi tere hain,
Aa gayi ab akl hm me kaarwaan bante jaayenge.

Chand jaise ghat ke aata apne poorn nikhar pe,
Hm bhi girate or sambhlte awashy jag mgayenge.

Qd abhi chhota mgr hai kl gagan muththi me hoga,
Jab himalay Bhr ke sooraj apne man me jagaayenge.
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Saturday, 13 September 2014

एक दूजे का साथ दें यही प्रसंशनीय है


देश की दशा अपने आप सुधर जाएगी 
जब कथनी कम हो करनी बढ़ जाएगी
चारों तरफ़ सिर्फ़ ख़ुशहाली हो जाएगी 
जब अनेकता में एकता घर बनाएगी

कहते हो तुम हिंदी की दशा दयनीय है 
आख़िर किसने किया इसे निंदनीय है
सिर्फ़ आरोप-प्रत्यारोप नहीं शोभनीय है  
एक दूजे का साथ दें यही प्रसंशनीय है

दीये से दीया जलाकर हर घर उजियारा हो
सबकी ख़ुशी सब हों सुखी बस ये नारा हो
न ये मेरा न ये तुम्हारा बस एक हमारा हो 
विश्व में परचम लहराएँ देश अपना प्यारा हो

सिर्फ़ अपना अपना फ़र्ज़ अदा करें ये वंदन है 
इस ओर जो क़दम बढ़ाए उसके सर चंदन है
सब में ईश्वर बसते हैं सब यहाँ रघुनन्दन है
आपके काम मैं आऊँ तो हार्दिक अभिनन्दन है  
-अभिषेक कुमार ''अभी''

Wednesday, 10 September 2014

दर्द की जुबाँ कहाँ/Dard ki jubaN kahan

दर्द की कोई 
जुबाँ कहाँ 
ये तो ख़ामोश हो 
दिल को 
एहसास कराती रहती है
हों महफ़िल में 
या तन्हाई में 
ये तो हरपल ही 
रूलाती रहती है 
चैन पाना चाहें
समझ न आये 
कहाँ को जायें
जहाँ भी जायें 
ये झट पहुँच जाती है
बिन पानी मछली सी
ज़िंदगी को 
छटपटाती रहती है
किसी को भी चाहत
दर्द की कहाँ ख़ुदा 
फिर क्यों ये 
बिन बुलाये ही 
आ जाती है 
रूलाती है 
तड़पाती है 
ये दर्द,
बहुत सताती है........
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Dard ki koi 
JubaN kahan
Ye to khamosh ho
Dil ko
Ehsaas krati rhti hai.
HoN mahfil me
Ya tanhai me
Ye to harpal hi
Roolati rhti hai.
Chain pana chaheN
Samjh na aaye
Kahan ko jayeN
Jahan bhi jayeN
Ye jhat pahunch jati hai
Bin pani machhli si
Zindagi ko
chhtpatati rhti hai.
Kisi ko bhi chahat 
Dard ki kahan khudaa
Fir kyun ye
Bin bulaye hi
Aa jati hai
Roolati hai
Tadpati hai
Ye dard,
Bahut satati hai........
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Wednesday, 3 September 2014

''अच्छे दिन आने वाले हैं''

एक गाँव में एक साधू महाराज पधारे। गाँव के लोग बहुत परेशान और हताश होके दिन गुज़ार रहे थे। तो उन सब को साधू बाबा में एक आशा की किरण नज़र आई। 
बाबा भी गाँव के बीच, एक पीपल के छाँव तले बैठ के नित् अपनी धुन रमाने लगे। गाँव के लोगों के घर से हर दिन कुछ न कुछ उनके जीवन यापन के लिए आने ही लगा। रोज़ शाम को साधू बाबा गाँव के लोगों से वार्तालाप करते थे, सभी की एक ही परेशानी थी, कि बाबा गुज़ारा अब चल नहीं पावत है, कोनो उपाय बताबअ !
साधू बाबा सब को मुख़ातिब हो बोलते, चिंता के कोनो बात नहिखे ''अच्छे दिन आवत हsss''। 
सब को बड़ी तसल्ली हुई, कि साधू महाराज ने कहा है, तो अच्छे दिन जल्द ही आने वाला होगा। गाँव वाले फिर अपने कार्य में लग गए। 
फिर कुछ दिन बाद पहुँचे, बोले बाबा ''अब तो गुज़ारे के लिए दो जुन रोटी पर भी आफ़त आ गई है'' !
साधू बाबा फिर दिलासा देते हुए बोले ''अच्छे दिन आने वाले हैं'' चिंता नाहि करो !

दिन बीतता गया, महीना भी निकल गया अब तो साल होने को आया ''गाँव वाले को ''चिंता न करो से भी अब चिंता होने लगी'' थी। अब वो साधू बाबा के पास जाना भी छोड़ दिए थे। 
पर, कुछ की भक्ति साधू महाराज पे बड़ी अटल थी, वो हार मानने वालों में से नहीं थे, वो लगातार जाते रहे और ''अच्छे दिन आने वाले हैं'' सुनते रहे। 
कुछ दिन बाद इन सब की हिम्मत भी जवाब दे गई, और अब इन्होंने भी जाना बंद कर दिया। लेकिन अंत तक एक प्रौढ़ व्यक्ति की उम्मीद नहीं हिली और वो जाता ही रहा और सुनता ही रहा ''अच्छे दिन आने वाले हैं''।

संयोग से एक दिन वो भी नहीं पहुँचा। बाबा को चिंता हुई, आख़िर वो उनका अटल विश्वासी था। बाबा ख़ुद उससे मिलने के लिए चल पड़े। जब उसके झोपड़ी के पास पहुँचे, तो गाँव वालों का जमावड़ा देखकर किसी से पूछा, क्या हुआ है ?

व्यक्ति बोला, रामबुधन्वा चल बसा !

बाबा ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए बोला, ''ये लो अब तो इसके अच्छे दिन आने ही वाले थे, और ये चला गया''

जैसे ही ये बात गाँव वालों ने सुनी, कि फिर जो बाबा की सुताई हुई, जो सुताई हुई, कि बाबा के भी प्राण पखेरू हो गए। 

(इस अभिव्यक्ति का किसी भी जीवित और मृत प्राणी से कोई सम्बन्ध नहीं है। बस एक चेष्टा है, कि अच्छे दिन तभी आएँगे जब हम सब अपना भला बुरा ख़ुद समझेंगे, उसे फलीभूत करेंगे, और एक दूसरे को सहयोग करेंगे। किसी भी एक आदमी के कहने से या कुछ करने से कभी अच्छे दिन नहीं आने वाले। ''उम्मीद के वृक्ष में, फल लगते हैं'' ये सिर्फ़ कहावत में ही अच्छे लगते हैं। यथार्थ में नहीं।)
सादर 
-अभिषेक कुमार ''अभी''

Wednesday, 27 August 2014

न इज़्हार न प्यार करना/N izhaar n pyaar karna

यहाँ हर किसी से न इज़्हार करना
यहाँ हर किसी से न अब प्यार करना

कहाँ हर कली ही गुलाब सी होती
किसी से भी संभल के इक़रार करना

यहाँ पीर काफ़िर बने घूमते हैं
जरा सोच कर अब ही इतिबार करना
 
क़दम दर क़दम ठोकरें भी मिले तो
ख़ुदी से कभी तुम न तक़रार करना

ग़मे ज़िंदगी क्यूँ बिताएँ यहाँ हम
ये रहमत ख़ुदा की है गुलज़ार करना

अगर तीरगी ज़िद्द पे आ गई है
'अभी' फ़िर दीये की तू बौछार करना 
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Yahan har kisi se n izhaar karna
Yahan har kisi se n ab pyaar karna

Kahan har kli hi gulab si hoti
Kisi se bhi sambhal ke ikraar karna

Yahan peer kafir bane ghumte hain
Jara soch kar ab hi itibaar karna

Qadam dar qadam thokren bhi mile to
Khudi se kabhi tum n taqraar karna

GmeN zindgi kyun bitayen yahan ham
Ye rahmat khuda ki hai gulzaar karna

Agar teergi zidd pe aa gyi hai
'Abhi' fir diye ki tu bauchhar karna
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Sunday, 24 August 2014

कैरियर एकदम सेट है।

रामबुधन जी के तीन बच्चे हुआ करते थे। 

वैसे हैं तो अब भी, मगर नहीं के बराबर। अब वो क्यों नहीं के बराबर हैं, ये जानते हैं :

बात उस समय की जब रामबुधन जी का बड़ा बेटा 14 साल का, मझला बेटा 12 और छोटा क़रीब 9 साल का था। ये उम्र ऐसी है, जिसमें हर माँ-बाप को अपने बच्चों पे निगरानी रखनी पड़ती है। रामबुधन जी भी सभी के क्रियाकलापों को जानने ख़ातिर, सभी को बिन बताये, उन पर नज़र रख रहे थे। कुछ ही दिन में तीनों का चाल प्रकृति उनको समझ में आ गया।

फ़िर एक दिन शाम को आँगन में बैठे चाय की चुस्की लेते हुए, अपने जीवन के हिस्सेदार से मुख़ातिब हो बोले, लक्ष्मी हमारे तीनों बेटों का कैरियर एकदम सेट है। लक्ष्मी जी प्रसन्न चित्त मुद्रा में बोली, क्यूँ जी कोई ज्योत्षी को दिखाए हैं क्या ?
रामबुधन जी बोले, अर्रे नहीं मेरे जीवन के खैव्या, ये हम कह रहे हैं हम। 

अब तपाक से लक्ष्मी जी बोल पड़ी कैसे ?
तो रामबुधन जी बोले, हमने दो दिन रामकिशन का पीछा किया कि आखिर ये दिन भर क्या सब करता है, तो पता चला की ये तो 
- बातें फेंकने में माहिर है। 
- अपने दोस्तों को ख़्वाब दिखा-दिखा कर उनसे सारा काम करवा लेता है।
- झूठ तो ऐसे बोलता है जैसे सत्यवादी रामकिशन यही हो साक्षात् और 
- सामने से हाथ जोड़ता है, फिर पीठ पीछे उसी को गाली।
अब तुम समझ जाओ ये क्या बनेगा !

और हमारा दूसरा बेटा ?
वो तो अपने नाम रामपाल और सेहत की तरह ही है।
- कभी किसी वाहन का किराया नहीं देता, चाहे वो बस वाला हो या रिक्शा वाला न जाने हर जगह किस बात का स्टाफ़ चलता है।
- बाज़ार जब भी जाता है हर दूकान में घुस के कुछ न कुछ खाके बिना पैसे दिए निकल जाता है। 
- और तो और ये कहते भी सुना कि एक दिन ऐसा आएगा की सब उसे महीने में पैसे भिजवाया करेंगे।
अब तुम समझ जाओ ये क्या बनेगा !

माँ तो माँ होती है, लक्ष्मी जी के चेहरे पे शिकन आ गई और मायूस स्वर में बोली, कि ऐ जी तीसरा क्या बनेगा ?
रामबुधन जी, गहरी सांस छोड़ते हुए बोले, वो रामचरण ! 
- वो भी अपने नाम जैसा ही है, दोनों भाइयों के चरणों में पड़ा रहता है।
- किसी भी दोस्त का काम पड़ता है तो, उनसे पैसे लेकर, दोनों भाइयों को कहता है मदद करने को।
- सभी में हमेशा अपने दोनों भाइयों की डींगे हांकता रहता है।

दिन बीतते गए, महीने बीत गए अब सालों गुज़र गए। 
रामबुधन जी की भविष्यवाणी सत्य हुई। बड़ा लड़का ''नेता'' बन गया, मझला ''पुलिसवाला'' बना और छोटा ''चपरासी'' बन बैठा। 

अब आप ही बताईये की क्या ये तीनों किसी के सगे हुए हैं ?
फिर रामबुधन जी के कैसे होते ! दोनों बूढ़ा-बुढ़िया गाँव में बसर कर रहे हैं और ये तीनों शहर में ऐश कर रहे हैं।
-अभिषेक कुमार ''अभी''

Friday, 22 August 2014

हम भी अब नेता बनेंगे !

एक था 'रामबुधन्वा', बेरोज़गार गाँव का नौजवान। 
एक दिन उसके गाँव में आ गए नेता जी। नेता जी के ठाठ-बाठ देखकर रामबुधन्वा भौंचक्का हो गया। नेता जी भी एक दम से चमचमाती बी.ऍम.डब्लू कार से उतरे, एक दम सफ़ेद चक्का-चक लिबास में, हाथ में दो ठो मुआइल लिए, लेफ़्ट और राइट में दो सुन्दर कन्या के हाथ में फ़ाइल और उसके पीछे, ये छः छः फ़ीट के दो गो जवान, एकदम काले लिबास में, आँखों पे चश्मा लगाए, हाथ में हथियार लिए। 
जैसे ही, रामबुधन्वा पहुँचा नेता जी से मिलने, कि तपाक से वो दोनों अंगरक्षक ने आगे बढ़कर रोक दिया, रामबुधन्वा भी ताव में आ गया, क्यूंकि वो नेता कोई और नहीं, उसका दोस्त था। जो गाँव में साथ पढ़ता था, फिर एक बार एकाएक गायब हो गया। रामबुधन्वा और दोनों अंगरक्षक में जोड़-जबरदस्ती होने लगी, तो उसने रामबुधन्वा को दे दिया धक्का। अब रामबुधन्वा गया गिर, बेचारे को चोट भी तेज़ लग गयी। 
पर किसी को क्या फ़र्क पड़ता है। नेता जी और उनका लाव-लश्कर आगे निकल गया और रामबुधन्वा वहाँ से उठकर घर की ओर निकल गया।

शाम हुई, खाने पे बैठा रामबुधन्वा अपने में ही खोया-खोया सा था, तो उसके पिता ने पूछा '' के हुआ रे तोहरे के ?''
रामबुधन्वा, नज़रें नीची करके बोला हम भी अब नेता बनेंगे !
रामबुधन्वा के घर सब लोग एक साथ हँसने लगे। हँस काहे रहे हो, हम सच कह रहे हैं, हम भी अब नेता बनेंगे !
इसपर उसके पिता ने कहा, ठीक है, अभी खाना खा कल नेता बनयो। 

अब रामबुधन्वा को रात भर नींद आई नहीं, सुबह उठते ही, पिता से बोला, हमखे बता बsss कि कैसे नेता बने ?
इस पर बड़े प्यार से पिता ने कहा, एक बात बता

- कभी किसी की हत्या की है ?
- नहीं ! पिता जी  
- कभी किसी के साथ बलात्कार ?
- छिः छिः कैसी बात पूछ रहे हैं आप 
- अच्छा चोरी की है ?
- नहीं तो 
- अच्छा किसी लड़की को तो छेड़ा ही होगा 
- नाहि ! हम अइसन नाहि हैं 
- अच्छा, गाँव वाले तो तेरे से डरते होंगे !
- अर्रे, कैसे डरेंगे हम तो सबसे प्यार से पेश आते हैं
- अच्छा अब अंतिम प्रश्न, कभी कोर्ट/कचहरी या हवालात गया है ?
- पिताजी आप भी कमाल कर रहे हैं, जब हमने ऐसा कोई गलत काम कभी किया ही नहीं है, तो काहे जायेंगे वो नरक में !

तो, मेरा भोला बेटा अब सुन, तू अपने सर से ये नेता बनने का भूत जल्दी उतार ले, तू नेता क्या उसका चपरासी भी नहीं बन सकता और अगर कोई काम नहीं मिल रहा है, तो खेती कर, भैंस पाल। क्यूंकि नेता बनने के लिए, ये सब ज़रूरी है। जो तूने कभी किया नहीं, और ना ही कभी कर सकता है। 
-अभिषेक कुमार ''अभी''

Saturday, 16 August 2014

एक नज़र ''पुस्तकाभारती प्रकाशन'' पर



एक सपना जो पिछले कई वर्षों से मन में पल रहा था, वो अब जाके अपने सफ़ल होने के कगार पर है। 
जी हाँ ! 
मेरे सभी स्नेही मित्रों, शुभचिंतकों और गुरुजनों, ''पुस्तकाभारती प्रकाशन'' के नाम से प्रकाशन के क्षेत्र में क़दम रख रहा हूँ।
''पुस्तकाभारती प्रकाशन'' का पंजीकरण प्रमाण पत्र आज ही मेरे हाथ में आया है।

जहाँ तक प्रकाशित पुस्तकों की सूची है, तो वो पहले चरण में ''10 पाण्डुलिपियों'' का चयन पहले ही हो चूका है, जिसमें 
१ व्यंग्य कथा संग्रह (एक)
२ हास्य कथा संग्रह (एक)
३ ग़ज़ल संग्रह (एक)
४ हिंदी ग़ज़ल संग्रह (एक)
५ उपन्यास संग्रह (एक)
६ काव्य संग्रह (दो)
७ साझा काव्य संग्रह (एक)
८ अंग्रेजी नॉवेल (दो)
लेख़क और लेखिकाओं का नाम बहुत जल्द पुस्तक के कवर पेज़ के साथ आपके सामने होगा।

इस कार्य को सफल बनाने में बहुत से गण-मान्य जनों का साथ मिला है, और और आगे भी देने का आश्वासन दिया है, उसके लिए मैं इन सभी का हार्दिक आभारी हूँ।

और अभी तो बस मैं यही कह पा रहा हूँ कि 
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर 
आप सब मिलते गए और कारवाँ बनता गया
साथ ही आप सभी मित्रों ने जो आज ४ साल से साथ निभाया है, हौसला बढ़ाया है 
उसके लिए भी आप सभी का हार्दिक धन्यवाद। इसी तरह आगे भी आप सब अपना स्नेह और आशीष इस प्रकाशन को भी देंगे ऐसा मैं आशा करता हूँ।

लक्ष्य : 
एक ऐसा प्रकाशन बनाना जो की साहित्यिक जगत में चल रहे राजनीति से दूर रहकर साहित्य को जन-जन तक पहुँचाये साथ ही छोटे-बड़े सभी की अभिव्यक्ति को सराहते हुए, उन्होंने आगे बढ़ाए।
जय माँ शारदे 
-अभिषेक कुमार ''अभी''
(+91-9953678024)

Thursday, 14 August 2014

जश्ने आज़ादी / Jashne Aazadi

हो गए हैं सरसठ साल 
दिन दिन बढ़ती आबादी है 
जश्ने आज़ादी जारी है
जश्ने आज़ादी जारी है

भूख से कितने ही लाचार हैं 
गली गली में फिरता भिखारी है 
जश्ने आज़ादी जारी है
जश्ने आज़ादी जारी है

पढ़ लिख के घूमे बिना काम
फ़ैली यहाँ बेरोज़गारी है
जश्ने आज़ादी जारी है
जश्ने आज़ादी जारी है

माँ का दर्ज़ा जिसको देते 
उसी को कोख़ में मारी है 
जश्ने आज़ादी जारी है  
जश्ने आज़ादी जारी है

नित् नित् होते हैं बलात्कार
फिर भी पलता बलात्कारी है
जश्ने आज़ादी जारी है
जश्ने आज़ादी जारी है

भ्रष्टाचार में ट्रॉफ़ी जीतते,फिर भी 
सत्ता पे क़ाबिज़ भ्रष्टाचारी है
जश्ने आज़ादी जारी है
जश्ने आज़ादी जारी है

जिस बेटे को अलग किया था 
वो बन बैठा अतिक्रमणकारी है 
फिर चुप हो सहते हम सब 
कैसी ये लाचारी है ?
जश्ने आज़ादी जारी है
जश्ने आज़ादी जारी है
(जय हिन्द, जय भारत)
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Ho gye hain sarsath saal
Din din badhti aabadi hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai

Bhookh se kitne hi lachar hain
Gli gli me firta bhikhari hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai

Padh likh ke ghume bina kaam
Faili yahan berozgari hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai

Maa darza jisko dete
Usi ko kokh me maari hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai

Nit nit hote hain blatkaar
Fir bhi palta blatkaari hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai

Bhrshtachar me trophy jit'te
Satta pe kabiz bhrshtachari hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai

Jis bete ko alag kiya tha
Wo ban baitha atikramnkari hai
Fir bhi chu ho sahte ham sab
Kaisi ye lachari hai
Jashne aazadi jari hai
Jashne aazadi jari hai
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Tuesday, 12 August 2014

अब ये मेरा जीवन/Ab ye mera jeevan

इतना बता दे उनको, जाके तू ऐ पवन
उनके बिना व्याकुल, अब ये मेरा जीवन

हरपल ही आस में बैठी, भूखी और प्यासी
वो छोड़ मुझे क्यूँ दूर, बनके जैसे सन्यासी
प्रीत में उनके जोगन बन फिरती वन में हूँ 
उनके बिन सुना सुना है, ये मेरा घर आँगन

इतना बता दे उनको, जाके तू ऐ पवन
उनके बिना व्याकुल, अब ये मेरा जीवन

मैं एक कली थी, बगियन की शोभा बढ़ाती 
मैं तो एक पंछी थी, ऊँचे गगन में विचरती 
जिसे देख मन हो हर्षित, नैन चैन पाते थे 
अब हरपल ही जलती है, मेरे अंदर अगन

इतना बता दे उनको, जाके तू ऐ पवन
उनके बिना व्याकुल, अब ये मेरा जीवन

उनसे प्रेम किया, उनसे ही निभाई प्रीत
बदले ये सिला मिला, लिखूँ विरह के गीत
बरखा बहे नैनों से, जीवन सुखा सुखा है
पीड़ा के बादल फटने से घायल मेरा तन

इतना बता दे उनको, जाके तू ऐ पवन
उनके बिना व्याकुल, अब ये मेरा जीवन
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Itna btaa de unko, jaake tu e pawan
Unke bina vyakul, ab ye mera jeevan

harpal hi aas me baithee, bhookhi or pyaasi
Wo chhod mujhe kyun door, bnke jaise sanyasi
Preet me unke jogan ban firtee van me hun
Unke bin suna suna hai, ye mera ghar aangan

Itna btaa de unko, jaake tu e pawan
Unke bina vyakul, ab ye mera jeevan

Main ek kalee thi, bagiyan ki shobhaa badhaati
Main to ek panchhi thi, unche gagan me vicharti
Jise dekh ke man ho harshit, nain chain pate the
Ab har pal hi jalti hai, mere andar agan

Itna btaa de unko, jaake tu e pawan
Unke bina vyakul, ab ye mera jeevan

Unse prem kiya, unse hi nibhai preet
Bdle ye sila mila, likhun virah ke geet
Brkha bahe naino se, jivan sukha sukha hai
Peeda ke badal fatne se ghayal mera tn

Itna btaa de unko, jaake tu e pawan
Unke bina vyakul, ab ye mera jeevan
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Friday, 8 August 2014

सुनो ! ऐसा क्यों / Suno ! Aisa Kyun

धीर-गम्भीर समुद्र में 
ये भीषण चक्रवात क्यों, 
अडिग-अटल पर्वतों पे 
ये भू-स्खलन क्यों,
वर्षों से भार ढ़ो रही 
है ये वसुंधरा 
और अब भू-कम्पन क्यों?

देवी-देवताओं को भी 
दौलत के तराजू में 
तौलने की ये होड़ क्यों, 
आदि-अनंत काल से 
चली आ रही 
अनेक परम्पराओं का 
दिन-प्रति दिन अंत क्यों?

पाप क्या, पुण्य क्या 
अब किसे है परवाह
स्वार्थों से वशीभूत होकर 
इंसानियत हो रही है स्वाहा।

सुनो,
स्वर्ग-नर्क कुछ भी नहीं 
कर्म और दुष्कर्म का 
फल भोगना है यहीं। 
कण-कण में हैं ईश्वर
नहीं सम्भले,
तो आने वाला है वो पल 
जब जग हो जायेगा नाश्वर !
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Dhir-gambhir samudra me
Ye bhishan chakrwaat kyun
Adig-atal parwaton pe
Ye bhu-skhalan kyun
Varshon se bhar dho rhi
Hai ye vasundhra
Or ab bhu-kampan kyun?

Devi-dewtaon ko bhi
Daulat ke tarazu me
Taulne ki ye hod kyun
Aadi-anant kaal se
Chli aa rhi
Anek parampraon(Tradition) ka
Din-parti din ant kyun?

Paap kya, puny kya
Ab kise hai parwaah
Swarthon se vashibhut hokar
Insaniyat ho rahi hai swahaa.

Suno,
Swarg-nark kuchh bhi nahi
Karm or dushkarm ka
Phal bhogna hai yahin.
Kan-kan me hain ishwar
Nahi sambhle,
To aane wala hai wo pal
Jab jag ho jayega Nashwar !
--Abhishek Kumar ''Abhi''

Wednesday, 30 July 2014

वास्ता रखते नहीं थे/Wasta rakhte nahi the

बहुत गुमसुम हो ऐसे तुम कभी रहते नहीं थे 
कभी हमसे ख़फ़ा होके कहीं टिकते नहीं थे

जरा सी बात क्या कह दी कि रिश्ता तोड़ बैठे
मेरी आवाज़ सुने जो बिन रहा करते नहीं थे

सफ़र के बीच में यूँ साथ क्यूँ छोड़ा है तुमने
कहीं जो बिन हमारे साथ के चलते नहीं थे

अदावत ये है कैसी जो निभा तुम अब रहे हो
मुहब्बत की क़सम खाते जो तुम थकते नहीं थे

जहाँ को छोड़ जिनके भाग हम पीछे रहे थे
'अभी' हमसे कभी वो वास्ता रखते नहीं थे
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Bahut gumsum ho aise tum kabhi rahte nahi the
Kabhi hmse khfaa hoke kahin tikte nahi the

Jara si baat kya kah di ki rishta tod baithe
Meri aawaz sune jo bin rha karte nahi the

Safar ke beech me yun saath kyun chhoda hai tumne
Kahin jo bin hmare saath ke chalte nahi the

Adawat ye hai kaisi jo nibha tum ab rhe ho
Muhbbat ki kasam khate jo tum thakte nahi the

Jahn ko chhod jinke bhag hm pichhe rhe the
'Abhi' hmse kabhi wo wasta rakhte nahi the
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Tuesday, 29 July 2014

ईद मनाना होगा/Eid Mnana Hoga

ख़ुदा की बंदगी करनी तो रोते को हँसाना होगा
हमें हर एक दिन को ईद के जैसा मनाना होगा

जहाँ में ख़ार ही बोई हुई है हर तरफ ही अब तो
हटा के इन सभी को अब गुलाबों को खिलाना होगा 

गले मिलके यहाँ दस्तूर को न अब निभाएँ हम सब
दिलों से नफ़रतों के बीज को पहले मिटाना होगा

न कोई धर्म कोई जात कोई भी न अब मज़हब हो   
यहाँ तो सिर्फ़ अब इंसान को इंसां बनाना होगा

अगर नापाक़ कोई भी करे अपनी ज़मीं को अब तो
क़फ़न ओढ़ लहू का कतरा 'अभी' मिलके बहाना होगा

ख़ुदा की बंदगी करनी तो रोते को हँसाना होगा
हमें हर एक दिन को ईद के जैसा मनाना होगा
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Khuda ki bandgi karni to rote ko hnsana hoga
Hmen har ek din ko eid ke jaisa mnana hoga

Jahan me khar hi boyi huyi hai har taraf hi ab to
Htaa ke in sbhi ko ab gulaaboN ko khilana hoga

Gle milke yahan dastur ko n ab nibhayen hm sab
Dilon se nfaratoN ke beej ko pahle mitana hoga

N koyi dhrm koyi jaat koyi bhi n ab mzhab ho
Yahan to sirf ab insan ko insan bnana hoga

Agar napaaq koyi bhi kre apni zamin ko ab to
Qafan odh lhoo ka katra 'abhi' milke bahana hoga

Khuda ki bandgi karni to rote ko hnsana hoga
Hmen har ek din ko eid ke jaisa mnana hoga
-Abhishek Kumar ''Abhi''

Sunday, 27 July 2014

एहसास

तुम्हारे होने के एहसास ने
वर्षों ज़िंदा मुझे रख्खा है 
तुम्हारे खोने के एहसास ने
जिस्म से जाँ जुदा रख्खा है

दूर जो एक पल को भी
तुम कभी न रह पाते थे
बिन हमारे साथ कहीं 
तुम कभी न जा पाते थे

कैसे रह पाते हो अब
इक बार बतला जाओ
कैसे मुस्कुराते हो अब 
इक बार दिखला जाओ

वीरान सी ज़िन्दगी मेरी
सुनसान राहों पे चल रही
हाँ! अच्छा नहीं कुछ अब 
तेरी कमी मुझे खल रही
--अभिषेक कुमार ''अभी''
Tumhare hone ke ehsaas ne
VarshoN zinda mujhe rkhkha hai
Tumhare khone ke ehsaas ne
Jism se jaan juda rkhkha hai...

Door jo ek pal ko bhi
Tum kabhi n rah pate the
Bin hmare saath kahin
Tum kabhi n ja pate the...

Kaise rah pate ho ab
Ik baar batla jao
Kaise muskurate ho ab
Ik baar dikhla jao...

Veeran si zindagi meri
Sunsaan rahoN pe chl rhi
Haan ! achchha nahi kuchh ab
Teri kami mujhe khl rhi...
--Abhishek Kumar ''Abhi''

Monday, 23 June 2014

हो रही दिल में/Ho rhi dil me

मौन जो थी, वो मुखर हो, रही दिल में
आज फिर तुम्हीं, विचर हो रही दिल में

भूल बैठे थे जिसे, एक मुद्दत से
याद उसकी, कैसे घर, हो रही दिल में

चैन ऐसे में, कहाँ को, मिले हमको 
आग के जैसे, असर हो, रही दिल में

बात जो उसकी, भली सी, कभी लगती
आज वो ज़हरे, असर हो रही दिल में

या ख़ुदाया, इश्क़ तूने, बनाया क्या 
चाह उड़ने की, बिन पर, हो रही दिल में  
--अभिषेक कुमार ''अभी''
Maun jo thi wo mukhar ho rhi dil me
Aaj fir tumhin vichar ho rhi dil me

Bhool baithe the jise ek muddat se
Yaad uski kaise ghar ho rhi dil me

Chain aise me kahan ko mile hamko
Aag ke jaise asar ho rhi dil me

Baat jo uski bhli si kabhi lagti
Aaj wo zahre asar ho rhi dil me

Ya khudaya ishq tune bnaya kya
Chah udne ki bin par ho rhi dil me
--Abhishek Kumar ''Abhi''

Monday, 16 June 2014

ज़िंदगी के उसूल/Zindagi ke usool

ज़िन्दगी में उसूल 
उन उसूलों पे चलना 
सबके बस की बात कहाँ। 
ये मेरा सौभाग्य है 
ऐसे इंसान को 
मैंने देखा यहाँ। 

न कोई साज 
न कोई सज्जा 
सादा जीवन जी कर। 
ख़ुशियों की बारिश की 
ग़म के आँसू 
पी पी कर।

मेरे मन की 
अब यही हसरत 
आप सा मैं भी बन पाऊँ।
हाँ पिताजी 
आपके राह पे 
मैं भी आगे चल पाऊँ। 
----''सादर प्रणाम''----
--अभिषेक कुमार ''अभी''
Zindagi me usool
Un usoolon pe chlna
Sabke bas ki baat kahan..
Ye mera saubhagy hai
Aise insaan ko
Maine dekha yahan.

N koi saaj
N koi sajja
Sada jeevan jee kar.
Khushiyon ki barish ki
Gam ke aansoo
Pee pee kar.

Mere man ki
Ab yahi hasarat
Aap sa main bhi ban paun..
Haan ! Pitaji
Aapke raah pe
Main bhi aage chal paun.
----Saadar Pranaam----
--Abhishek Kumar ''Abhi''

Wednesday, 4 June 2014

नज़र में मंज़िल हो/Nazar me manzil ho

सफ़र कितना भी मुश्किल हो
नज़र में सिर्फ़ मंज़िल हो

अता इतनी सी कर मौला
जो दे हमदर्द आदिल हो

मिला उससे न, जो समझे
न कोई हमसे क़ाबिल हो

मुझे मंज़ूर वो हर दुश्मन
जो दुश्मन हो, न जाहिल हो

मैं दिल तो दे किसी को दूँ
नज़र में वो तो दाख़िल हो 

गिला कोई न शिकवा कर
'अभी' ज़िंदा सदा दिल हो
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Safar kitna bhi mushkil ho
Nazar me sirf manzil ho

Ataa itni si maula kar
Jo de hmdard aadil ho

Mila us se n, jo samjhe
N koyi hmse qabil ho

Mujhe manzur wo hr dushmn
Jo dushmn ho, n jaahil ho

Main dil to de kisi ko dun
Nazar me wo to dakhil ho

Gila koyi n shikwa kar
'Abhi' zinda sdaa dil ho
-Abhishek Kumar ''Abhi''