Sunday, 27 July 2014

एहसास

तुम्हारे होने के एहसास ने
वर्षों ज़िंदा मुझे रख्खा है 
तुम्हारे खोने के एहसास ने
जिस्म से जाँ जुदा रख्खा है

दूर जो एक पल को भी
तुम कभी न रह पाते थे
बिन हमारे साथ कहीं 
तुम कभी न जा पाते थे

कैसे रह पाते हो अब
इक बार बतला जाओ
कैसे मुस्कुराते हो अब 
इक बार दिखला जाओ

वीरान सी ज़िन्दगी मेरी
सुनसान राहों पे चल रही
हाँ! अच्छा नहीं कुछ अब 
तेरी कमी मुझे खल रही
--अभिषेक कुमार ''अभी''
Tumhare hone ke ehsaas ne
VarshoN zinda mujhe rkhkha hai
Tumhare khone ke ehsaas ne
Jism se jaan juda rkhkha hai...

Door jo ek pal ko bhi
Tum kabhi n rah pate the
Bin hmare saath kahin
Tum kabhi n ja pate the...

Kaise rah pate ho ab
Ik baar batla jao
Kaise muskurate ho ab
Ik baar dikhla jao...

Veeran si zindagi meri
Sunsaan rahoN pe chl rhi
Haan ! achchha nahi kuchh ab
Teri kami mujhe khl rhi...
--Abhishek Kumar ''Abhi''

15 comments:

  1. वीरान सी ज़िन्दगी मेरी
    सुनसान राहों पे चल रही
    हाँ! अच्छा नहीं कुछ अब
    तेरी कमी मुझे खल रही......bahut sundar

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  2. सुंदर बेहद सुंदर रचना व लेखन , अभिषेक भाई धन्यवाद !
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  3. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 28 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  4. वाह...लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  5. बहुत सुंदर !

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  6. आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 28 . 7 . 2014 दिन सोमवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  7. विरह की वेदना को अभिव्यक्त कराती भावपूर्ण रचना ।

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  8. बहुत सुंदर एवं भावपूर्ण रचना .............keep writing.............

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  9. ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति...बधाई

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  10. आपकी लिखी रचना बुधवार 30 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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