
देश की दशा अपने आप सुधर जाएगी
जब कथनी कम हो करनी बढ़ जाएगी
चारों तरफ़ सिर्फ़ ख़ुशहाली हो जाएगी
जब अनेकता में एकता घर बनाएगी
कहते हो तुम हिंदी की दशा दयनीय है
आख़िर किसने किया इसे निंदनीय है
सिर्फ़ आरोप-प्रत्यारोप नहीं शोभनीय है
एक दूजे का साथ दें यही प्रसंशनीय है
दीये से दीया जलाकर हर घर उजियारा हो
सबकी ख़ुशी सब हों सुखी बस ये नारा हो
न ये मेरा न ये तुम्हारा बस एक हमारा हो
विश्व में परचम लहराएँ देश अपना प्यारा हो
सिर्फ़ अपना अपना फ़र्ज़ अदा करें ये वंदन है
इस ओर जो क़दम बढ़ाए उसके सर चंदन है
सब में ईश्वर बसते हैं सब यहाँ रघुनन्दन है
आपके काम मैं आऊँ तो हार्दिक अभिनन्दन है
-अभिषेक कुमार ''अभी''
pyari chah,uttam sandesh....umda..
ReplyDeleteRation Card
ReplyDeleteआपने बहुत अच्छा लेखा लिखा है, जिसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।