Saturday, 13 September 2014

एक दूजे का साथ दें यही प्रसंशनीय है


देश की दशा अपने आप सुधर जाएगी 
जब कथनी कम हो करनी बढ़ जाएगी
चारों तरफ़ सिर्फ़ ख़ुशहाली हो जाएगी 
जब अनेकता में एकता घर बनाएगी

कहते हो तुम हिंदी की दशा दयनीय है 
आख़िर किसने किया इसे निंदनीय है
सिर्फ़ आरोप-प्रत्यारोप नहीं शोभनीय है  
एक दूजे का साथ दें यही प्रसंशनीय है

दीये से दीया जलाकर हर घर उजियारा हो
सबकी ख़ुशी सब हों सुखी बस ये नारा हो
न ये मेरा न ये तुम्हारा बस एक हमारा हो 
विश्व में परचम लहराएँ देश अपना प्यारा हो

सिर्फ़ अपना अपना फ़र्ज़ अदा करें ये वंदन है 
इस ओर जो क़दम बढ़ाए उसके सर चंदन है
सब में ईश्वर बसते हैं सब यहाँ रघुनन्दन है
आपके काम मैं आऊँ तो हार्दिक अभिनन्दन है  
-अभिषेक कुमार ''अभी''

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