Friday, 8 August 2014

सुनो ! ऐसा क्यों / Suno ! Aisa Kyun

धीर-गम्भीर समुद्र में 
ये भीषण चक्रवात क्यों, 
अडिग-अटल पर्वतों पे 
ये भू-स्खलन क्यों,
वर्षों से भार ढ़ो रही 
है ये वसुंधरा 
और अब भू-कम्पन क्यों?

देवी-देवताओं को भी 
दौलत के तराजू में 
तौलने की ये होड़ क्यों, 
आदि-अनंत काल से 
चली आ रही 
अनेक परम्पराओं का 
दिन-प्रति दिन अंत क्यों?

पाप क्या, पुण्य क्या 
अब किसे है परवाह
स्वार्थों से वशीभूत होकर 
इंसानियत हो रही है स्वाहा।

सुनो,
स्वर्ग-नर्क कुछ भी नहीं 
कर्म और दुष्कर्म का 
फल भोगना है यहीं। 
कण-कण में हैं ईश्वर
नहीं सम्भले,
तो आने वाला है वो पल 
जब जग हो जायेगा नाश्वर !
-अभिषेक कुमार ''अभी''
Dhir-gambhir samudra me
Ye bhishan chakrwaat kyun
Adig-atal parwaton pe
Ye bhu-skhalan kyun
Varshon se bhar dho rhi
Hai ye vasundhra
Or ab bhu-kampan kyun?

Devi-dewtaon ko bhi
Daulat ke tarazu me
Taulne ki ye hod kyun
Aadi-anant kaal se
Chli aa rhi
Anek parampraon(Tradition) ka
Din-parti din ant kyun?

Paap kya, puny kya
Ab kise hai parwaah
Swarthon se vashibhut hokar
Insaniyat ho rahi hai swahaa.

Suno,
Swarg-nark kuchh bhi nahi
Karm or dushkarm ka
Phal bhogna hai yahin.
Kan-kan me hain ishwar
Nahi sambhle,
To aane wala hai wo pal
Jab jag ho jayega Nashwar !
--Abhishek Kumar ''Abhi''

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-08-2014) को "अत्यल्प है यह आयु" (चर्चा मंच 1700) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. vividh visyon ko samet ke likhi rachnaa ... sundar rachna ...

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  3. सटीक प्रश्न उठाती बहुत सुन्दर रचना...

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  4. ati har jagah buri hoti hai bas yahi ho raha hai ....bahut sundar rachna

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  5. सार्थक और सुंदर प्रस्तुति

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