Tuesday, 18 March 2014

लिख ग़ज़ल हैं रहे

प्रेम के मायने, क्यूँ बदल हैं रहे
देख दिल रो पड़ा, लिख ग़ज़ल हैं रहे

इश्क़ की राह में, लोग फिसले बहुत
जानते हैं सभी, पर फिसल हैं रहे

मैं कहाँ था, कहाँ आज, हूँ आ गया
बात सुन के यहाँ, कर अमल हैं रहे

दौर कैसा चला, किस तरह का चलन
मुंह मुझको चिढ़ा, खिल कमल हैं रहे 

जानते एक दिन, मौत आनी मगर
मौत से आज, सारे दहल हैं रहे

हर कदम देख के, अब बढ़ाना 'अभी' 
यहाँ जज़्बात, को सब, मसल हैं रहे
--अभिषेक कुमार ''अभी''


Prem ke mayne, kyun badal hain rhe.
Dekh dil ro pada, likh gazal hain rhe.

Ishq ki raah me, log fisle bahut
Jante hain sabhi, par fisal hain rhe.

Main kahan tha, kahan aaj, hun aa gya
Baat sun ke yahan, kar amal hain rhe.

Daur kaisa chla, kis tarah ka chalan
Munh mujhko chidha, khil kamal hain rhe.

Jante ek din, maut aani magar 
Maut se aaj saare, dahal hain rhe.

Har qadam dekh ke ab badhana 'abhi'
Yahan jazbaat ko sab masal hain rhe.
--Abhishek Kumar ''Abhi''

22 comments:

  1. इश्क़ की राह में, लोग फिसले बहुत
    जानते हैं सभी, पर फिसल हैं रहे........
    .....hmmmm....nice post...G....:-)

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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  2. जानते एक दिन, मौत आनी मगर
    मौत से आज, सारे दहल हैं रहे...bahut sundar

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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  3. जानते एक दिन, मौत आनी मगर
    मौत से आज, सारे दहल हैं रहे
    बहुत सुंदर रचना.

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (19-03-2014) को समाचार आरोग्य, करे यह चर्चा रविकर : चर्चा मंच 1556 पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय आपका ह्रदय के अंतःकरण से आभारी हूँ, जो आप मेरी अभिव्यक्ति को जन जन तक पहुँचाने में सहयोग कर रहे हैं।
      नित् नमन
      सादर

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  6. बहुत बढ़िया अभिषेक जी , आनंद आ गया , धन्यवाद
    नया प्रकाशन -: बुद्धिवर्धक कहानियाँ - ( ~ अतिथि-यज्ञ ~ ) - { Inspiring stories part - 2 }
    बीता प्रकाशन -: होली गीत - { रंगों का महत्व }

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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  7. जानते एक दिन, मौत आनी मगर
    मौत से आज, सारे दहल हैं रहे
    ...वाह...बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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  9. सभी शेर बहुत बढ़िया, बधाई.

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    1. आपने ग़ज़ल पढ़ी और जो हौसला अफ़ज़ाई के अलफ़ाज़ कही वो मेरे लिए बहुत ही महतवपूर्ण हैं। आगे भी सैदेव आशान्वित रहूँगा।
      सादर

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  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (23-03-2014) को इन्द्रधनुषी माहौल: चर्चा मंच-1560 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय आपका ह्रदय के अंतःकरण से आभारी हूँ, जो आप मेरी अभिव्यक्ति को जन जन तक पहुँचाने में सहयोग कर रहे हैं।
      नित् नमन
      सादर

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  11. प्रेम के मायने, क्यूँ बदल हैं रहे
    देख दिल रो पड़ा, लिख ग़ज़ल हैं रहे

    इश्क़ की राह में, लोग फिसले बहुत
    जानते हैं सभी, पर फिसल हैं रहे

    मैं कहाँ था, कहाँ आज, हूँ आ गया
    बात सुन के यहाँ, कर अमल हैं रहे

    दौर कैसा चला, किस तरह का चलन
    मुंह मुझको चिढ़ा, खिल कमल हैं रहे

    जानते एक दिन, मौत आनी मगर
    मौत से आज, सारे दहल हैं रहे

    हर कदम देख के, अब बढ़ाना 'अभी'
    यहाँ जज़्बात, को सब, मसल हैं रहे
    --अभिषेक कुमार ''अभी''
    अच्छी कही है गज़ल अशआर भी हैं सभी नए

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    1. आदरणीय वीरेंदर सर जी, सादर प्रणाम
      हृदय के अंतःकरण से आपका आभारी हूँ। बहुत ही उर्ज़ांवित करने वाली आपकी हौसला अफ़ज़ाई।
      सादर

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