Wednesday, 26 February 2014

कंचन है मुख पे छाई (गीत)/Kanchan hai mukh pe chhai

कंचन है मुख पे छाई
आँखों में है तरुणाई
हे सुंदरी बताओ हमें
कहाँ से तुम हो आई
.
कंचन है मुख पे छाई
आँखों में है तरुणाई
.
यौवन है दमका दमका
है रूप चमका चमका
ले सुबह तुमसे लाली 
और शाम ले अंगराई
कंचन है मुख पे छाई
आँखों में है तरुणाई
.
आँखों ने देखा जबसे 
कानों ने सुना जबसे
किया ऐसा तुमने जादू
कि दिल में उतर आई
.
हे सुंदरी बताओ हमें
कहाँ से तुम हो आई
.
हरपल हमारी आखें
देखे तुम्हारी राहें
दिल रहता खोया खोया
रातों की नींद उड़ाई
.
हे सुंदरी बताओ हमें
कहाँ से तुम हो आई
—अभिषेक कुमार ''अभी''



Kanchn hai mukh pe chhai
Aankhon me hai tarunaai
He sundari batao hamen
Kahan se tum ho aayi….
.
Kanchn hai mukh pe chhai
Aankhon me hai tarunaai…
.
Yauvan hai damka-damka
Hai roop chamka-chamka
Le subah tumse lalee
Or shaam le angraai….
.
Kanchn hai mukh pe chhai
Aankhon me hai tarunaai…
.
Aankhon ne dekha jabse
Kaanon ne sunaa jabse
Kiya aisa tumne jaadoo
Ki dil me utar aayi….
.
He sundari batao hamen
Kahan se tum ho aayi….
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Harpal hamaari aankhen
Dekhe tumhari raahen
Dil rahta khoya-khoya
Raton ki neend udaai…
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He sundari batao hamen
Kahan se tum ho aayi….
—Abhishek Kumar ''Abhi''

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (28-02-2014) को "शिवरात्रि दोहावली" (चर्चा अंक : 1537) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय सर जी, सादर आभार और प्रणाम।

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