Saturday, 31 May 2014

हम मुस्कुराते रहे/Hm Muskurate rhe

वो ज़ख़्म देते हम मुस्कुराते रहे 
अहले वफ़ा हम यूँ भी निभाते रहे

कुछ इस तरह रिश्ता दर्द से जोड़ लिया
हम चोट खाकर भी गुनगुनाते रहे

ये ज़िंदगी इक शतरंज सा है बिछा  
प्यादे भी आके आँखें दिखाते रहे 

क़िस्मत हमेशा ही गर्दिशों में रही
अपना बना के सभी आजमाते रहे

बस इक ख़ुदा की रहमत 'अभी' पर रहे  
तूफ़ान फिर आते और जाते रहे
--अभिषेक कुमार ''अभी''
Wo zakhm dete hm muskurate rhe
Ahle wafa hm yun bhi nibhate rhe

Kuchh is tarah rishta dard se jod liya
Hm chot kha kar bhi gungunate rhe

Ye zindagi ik shtaranj sa hai bichha
Pyaade bhi aake aankhen dikhate rhe

Kismat hamesha hi gardishon me rhi
Apna banake sabhi aajmaate rhe

Bas ik khuda ki rahmat 'abhi' par rhe
Toofan fir aate aur jaate rhe
--Abhishek Kumar ''Abhi''

5 comments:

  1. बहुत खूब भाई .. मतले का शेर ही बहुत सुन्दर है ..
    वो ज़ख़्म देते हम मुस्कुराते रहे
    अहले वफ़ा हम यूँ भी निभाते रहे
    हर शेर बहुत सुन्दर हुआ है..

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  2. सुंदर ग़ज़ल

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  3. कुछ इस तरह रिश्ता दर्द से जोड़ लिया
    हम चोट खाकर भी गुनगुनाते रहे
    खूबसूरत ग़ज़ल

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  4. कुछ इस तरह रिश्ता दर्द से जोड़ लिया
    हम चोट खाकर भी गुनगुनाते रहे ..

    लाजवाब शेर हैं ... बहुत ही उम्दा ग़ज़ल ...

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